Wednesday, December 9, 2009

भक्तों की वाणी : आश्रम के लिए सर्वोपरि!!

हमारे आश्रम में भक्तों की वाणी को विशेष महत्व दिया जाता है.

हम समझते हैं कि भक्तों से हम हैं, हम से भक्त नहीं.

नोट:

-भक्त अपने मन की बात खुल कर कहें.

-यहाँ भक्तों का मजाक नहीं उड़ाया जाता.

-भक्त और भगवान के बीच हम सेतु मात्र हैं.


भक्त १:

मैं पिछले बहुत दिनों से अपना चिट्ठा लिख रहा था मगर कोई पढ़ता ही नहीं था. हताश होकर बाबा की शरण में आया. उन्होंने एग्रीगेटरर्स पर मेरा पंजीकरण कराया और शुभाशीष दिये. अब ढ़ेरों पाठक हैं. बाबा जी की जय. बाबा जी के आश्रम की अंगूठी चमत्कारी सिद्ध हुई.


भक्त २:

बाबा की विशेष कृपा है. जैसे ही हवन करवाया, तुरंत टिप्पणियों का अंबार लग गया और बाबा ने इसके गुर सिखाये. बाबा जी के जितने भी गुण गाऊँ, कम है. सर्वमनोकामना सिद्धि यंत्र बाबा जी से प्राण प्रतिष्ठा करवा कर ब्लॉग पर लगाने से अद्भुत परिणाम मिले.


भक्त ३:

बाबा जी लिखने पढ़ने का सलीका सिखाया. लोगों का आदर करना सिखाया. बाबा जी ने मुझे सही और सार्थक जीवन की राह दिखाई. उनके द्वारा दिया गया लॉकेट हर वक्त धारण रखता हूँ. इससे मुझे जबरदस्त आत्मविश्वास मिलता है.


बाबा जी जिन्दाबाद.

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-बाकी भक्तों की वाणी भी लगातार प्रकाशित की जाती रहेगी.

-भक्तों की वाणी को बाबा श्री के प्रवचन के पहले जगह मिलेगी.

-बाबा अपने शिष्य बाबा ताऊ आनन्द को भी तभी प्रवचन करने की अनुमति देते हैं, जब भक्त बोल चुके हों.
शिष्यों को भक्तों से उपर जगह दी जाये, कम से कम इस आश्रम की यह परंपरा नहीं.


-आश्रम मेनेजमेन्ट

5 comments:

  1. साष्टांग चरण स्पर्श ! सदा की तरह आज का भी उपदेश बहुत अच्छा लगा। ज्ञान चक्षु खुले। अब तो लगता है वैतरणी पार हो ही जाएगी।

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  2. जय हो बाबाओं की ! प्रणाम स्वीकार करें !

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  3. महाराज जी की जय हो, अब मैने नया "वसन" भी खरीद लिया है, दीक्षा देने की महती कृपा करें,
    आपका
    स्वामी ललितानंद

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  4. महाराज की जय!!!

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  5. लो जी चेला बनने हम भी आ ही गये!

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