प्रिय भक्तों,
हमारे इस प्रथम प्रवचन मे आपका हार्दिक स्वागत है। आपकी विहंगम उपस्थिति से हम प्रफ़ुल्लित हैं. आज समस्त चराचर जगत दुख से परेशान हो रहा है.चारों तरफ़ हाहाकार मचा हुआ है। कोई किसी की टांग के पीछे पड़ा है कोई किसी के कान के पीछे पड़ा है, हम साक्षी भाव से घटित को देख रहे है और चिंतन कर रहे हैं. आज हम अपने मनीषियों के दिए ज्ञान के पंथ से विमुख हो कर नित नये दुखों से त्रस्त हैं, हमें अपनी सस्कृति के प्रति रूचि होगी तो ज्ञान होगा, ज्ञान होगा तो मंगल होगा, ध्यान होगा तो भक्ति का उदय होगा, भक्ति से आनंद का उदय होगा. जिस आनंद से आज हम वंचित है वह हमें सहज ही प्राप्त होगा, इस लिए हमने चिंतन करके कुछ सद्वचन भक्तों के मार्ग दर्शन के लिए कहे हैं. उस पर अमल करके आप इस चराचर जगत के आनंद को प्राप्त कर सकते हैं.हमारे द्वारा रचित एक कविता सुनिये। और इसपर मनन करके परम शांति को प्राप्त होईये।
कहू नानक सुन रे मना, दुर्लभ मानुष देह"
मनन शील होंने पर ही प्राणी सदा मनुष्य कहलाता है।
नित चिंतन करने से ही सदा राह प्रभु की पाता है॥
सोने से पहले सोचो जरा, क्या प्यारे प्रभु को याद किया
चुगली, निंदा, बुरे कर्म में कितना समय बरबाद किया
अपने वचन कर्म से आज समाज का कितना हित किया
तुच्छ लाभ पाने हेतु गरीब को, हक से वंचित नही किया
मैंने कितना निर्माण किया, कितना किसको उजाड़ दिया
इर्ष्या, जलन, द्वेष डाह से युक्त, कितना किसका बिगाड़ किया
अच्छे बुरे की पहचान करने में कहीं भूल तो नहीं हुई
मेरे कारण किसी प्राणी की आज जन तो नहीं गई
मेरी वाणी स्वभाव बर्ताव से कोई दुखी तो नहीं हुआ
कोई पीड़ित खिन्न या त्रस्त तो मुझसे नहीं हुआ
क्या सामाजिक न्याय और शोषण में मै भी भागीदार बना
शोषण का शिकार हुआ या उसका प्रतिकार किया घना
जीवन में दुःख का कारण जानने आत्म निरिक्षण स्वयं ही करें
क्रिया व्यवहार और वाणी में दोषों को पकड़ें और स्वयं ही दूर करें
नित यह चिंतन करके देखो बढ़ी दूरियां कैसे घटती हैं
कैसे घटता कटुतापन निराशा कैसे संबंधों की बेली बढ़ती है
ध्यान रहे! प्रत्येक कार्य में ईश्वर का नित स्मरण रहे
फिर जीवन हो जाये नंदनवन, क्यों दुःख का आभरण रहे
स्वामी ललितानंद जी महाराज
आप सभी उपस्थित भक्तों को स्वामी ललितानंद जी महाराज का आशीष ।

.jpg)
