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Thursday, December 17, 2009

स्वामी ललितानंद महाराज प्रवचनमाला भाग -4- सोच समझ कर बोलो!!!


बाबा स्वामी ललितानंद महाराज




प्रिय भक्तों,
आज प्रवचन माला का चौथा दिन है.आपका हार्दिक स्वागत है। भक्तों की उपस्थिति दिनों-दिन बढ़ते रही है. आगे के प्रवचनों में पंडाल का विस्तार किया गया है. सेवा के लिए आश्रम में नए भक्त भी आ रहे हैं ताकि आपको परेशानी मत हो. आप शांति से बैठ कर सद्वचनों का श्रवण करें.आपकी विहंगम उपस्थिति से हम प्रफ़ुल्लित हैं.

उपस्थित सज्जनों और सन्नारियों और प्यारे बच्चा लोगों को आशीर्वाद, कल के शब्द के चिंतन को हम आगे बढ़ाते हैं.


हमें अपनी वाणी पर नियंत्रण रखना चाहिए. ईश्वर ने हमें वाणी का उपहार सभी प्राणियों की भलाई के लिए दिया है. इसलिए वाणी का उपयोग प्राणियों की भलाई के लिए होना चाहिए. हानि के लिए नहीं.

मनुष्य को मितभाषी होना चाहिए. जब जब मनुष्य अधिक बोलेगा तो मर्यादाओं का अतिक्रमण होगा और वह स्वयं ही लोगों का कोप भाजन बन जायेगा. अत: हित भाषण के साथ मित भाषण भी आवश्यक है.


हमारे मनीषियों ने मित भाषण के विषय में बहुत ही मनोहारी वचन कहे है.


सक्तुमिव तितउना पुनन्तो यत्र धीरा मनसा वाचमक्रत.
अत्र सखाय: सख्यानि जानते भद्रैषाम लक्ष्मीर्निहिताधि वाचि.

जैसे सत्तू को पानी में घोलने से पहले छलनी में छान कर देख लेते हैं कि ऐसी कोई अभक्ष्य वास्तु ना चली जाये जो पेट में विकार पैदा करे. उसी प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति शब्द रूपी आटे को मंत्र रूपी छलनी में छान कर बोलता है.ऐसे लोग ही मित्रता बनाये रखने के नियमो को जानते हैं और मंत्रणा (सोच समझ) कर बोलने वाले पुरुष और स्त्री की वाणी में लक्ष्मी, शोभा और संपत्ति निवास करती है.


जिव्हाया अग्रे मधु में जिव्हा मूले मधुलकं.


हे मनुष्य ईश्वर से प्रार्थना कर कि "मेरी वाणी के अग्र भाग में मधु रहे और जीभ की जड़ अर्थात बुद्धि में मधु का छत्ता रहे. जहाँ मिठास का भंडार भरा रहे.


नीतिकार ने कहा है.

रोहति सायकैर्विध्दम छिन्नं रोहति चासिना
वाचो दुरुक्तं विभत्सम न पुरोहति वाकक्षतं.

तीरों का घाव भर जाता है., तलवार से कटा हुआ भी ठीक हो जाता है. किन्तु कठोर वाणी का भयंकर घाव कभी नहीं भरता.

उर्दू शायर ने कहा है

नोके-जुबां से तेरे सीने को छेद डाला
तरकश में है तीर या है जुबां दहन में

किसी अंग्रेजी कवि ने कहा है

Speak gently! -- it is a little thing
Dropped in the heart's deep well;
The good, the joy, which it may bring,
Eternity shall tell.


मधुर भाषण एक छोटी वस्तु है, किन्तु यह ह्रदय के गंभीर कुंए में गिराई जाती है. इसके परिणाम स्वरूप जो सुख और प्रसन्नता प्राप्त होती है उसे समय ही बत्येगा.

एक दुसरे विद्वान् ने भी बड़े ही सुन्दर ढंग से कहा है.

"These abuses and taunts can be forgiven, but not forgotten"


किसी के अपशब्द और व्यंग्य वचन क्षमा तो किये जा सकते हैं , लेकिन भुलाये नहीं जा सकते.


इसी लिए भक्तों वाणी के महत्व को समझो और इसका सदुपयोग करो,


अधरों पर शब्दों को लिखकर मन के भेद ना खोलो
मैं आँखों से ही सुन सकता हूँ तुम आँखों से ही बोलो


फिर करना निष्पक्ष विवेचन मेरे गुण और दोषों का
पहले अपने मन के कलुष नयन के गंगा जल में धोलो


संबंधों की असिधारा पर चलना बहुत कठिन है
पग धरने से पहले अपने विश्वासों को तोलो


स्नेह रहित जीवन का कोई अर्थ नहीं होता है
मेरे मीत ना बन पाओ तो और किसी के होलो


ये वाणी वाण ह्रदय को छलनी कर देते हैं.
सत्य बहुत तीखा होता है सोच समझ कर बोलो


भक्तों आज अपने ज्ञान की गंगा में स्नान किया, इसका लाभ आपको अवश्य मिलेगा. अब कल का प्रवचन हमारे बड़े महाराज स्वामी ताऊआनंद जी महाराज करेंगे. आप श्रवण दर्शन लाभ प्राप्त करे.


स्वामी ललितानंद जी महाराज

आप सभी उपस्थित भक्तों को स्वामी ललितानंद जी महाराज का आशीष।

Tuesday, December 15, 2009

स्वामी ललितानंद महाराज प्रवचनमाला भाग - 3- शब्दै मारा गिर पड़ा








बाबा स्वामी ललितानंद महाराज




प्रिय भक्तों,
हमारे इस  प्रवचन की तीसरी माला में आपका हार्दिक स्वागत है।


आज हम "शब्द" पर बात करते हैं, ईश्वर अपनी बात और मनोभावों को व्यक्त करने के लिए वाणी का अनुपम उपहार दिया है,  इस उपहार के लिए हम परम पिता परम पिता परमेश्वर को धन्यवाद देते हैं, और उनके प्रति कृतज्ञता प्रगट करते है, 


शब्द की महिमा अपरम्पार है, कहा गया हैं न "बातन हाथी पाईये और बातन हाथी पांव" मुंह से निकला हुआ शब्द कभी व्यर्थ नहीं जाता और जब शब्द मुंह से बाहर निकल जाता है तो वह अपना प्रभाव उत्पन्न कर परिणाम भी देता है. यह परिणाम हमें कभी प्रत्यक्ष रूप से और कभी अप्रत्यक्ष रूप से प्राप्त होता  ही है. 


इसी लिए हमारे मनीषियों ने कहा है, "सत्यं ब्रूयात प्रियं ब्रूयात, अप्रियम सत्यं  न ब्रूयात" अगर आपको सत्य भी कहीं कहना पड़े तो उसे प्रियता के साथ कहें क्योंकि सदा से सत्य कहना,बोलना और सुनना हमेशा कठिन रहा है.  


हथियार का घाव भर जाता है लेकिन शब्द की मार का घाव नही भरता है. 


"ये वाणी वाण ह्रदय को छलनी कर देते हैं, सत्य बहुत तीखा होता है, सोच समझ कर बोलो"


इसलिए भक्तों सोच समझ कर चिंतन करके बोलना आवश्यक है. मोल तोल के बोलने वाला हमेशा सुखों को प्राप्त  करता है और कटु वचन कहने वाला व्यक्ति स्वयं ही संतापों से घिर जाता है, इसलिए हमें बहुत ध्यान से बोलना चाहिए,  


यही शब्द ही शत्रु और मित्र बनाते हैं, इस लिए भक्तों हमें उस कटु वाणी और शब्दों से बचना चाहिए जो संतापकारी हैं, जो शब्द हम अपने लिए सुनना नहीं चाहते वे शब्द हम दूसरों को कहने से बचें तो अवश्य ही हमारे जीवन में एक नए आनंद का संचार होगा


हमारे संतों ने शब्द की महिमा का बखान किया है उस पर अमल करके आप इस चराचर जगत के आनंद को प्राप्त कर सकते हैं.और इसपर मनन करके परम शांति को प्राप्त कर सकते हैं। 




आज बस इतना ही, ॐ ॐ  शांति शांति शांति,



शब्दै  मारा   गिर      पड़ा,    शब्दै      छोड़ा     राज.
जिन्ह-जिन्ह  शब्द विवेकिया,तिन्ह का सरिगो काज .


एक शब्द गुरु देव का, ता का अनंत विचार
थाके  मुनि  जन  पंडिता,   बेद ना पावे पार


शब्द हमारा तू शब्द का, सुनि मति जाहू सरक 
जो चाहो निज सुख को, तो शब्द ही लेहु परख 


शब्द बिना सुरति आंधरी,कहा कहाँ को जाय 
द्वार ना पावे शब्द का, फिर फिर भटका खाय  





स्वामी ललितानंद महाराज जी

  
आप सभी उपस्थित भक्तों को  स्वामी ललितानंद जी महाराज का आशीष ।

  



Sunday, December 13, 2009

स्वामी ललितानंद महाराज प्रवचनमाला भाग - 2 "गुरु सिकलीगर कीजिए"




बाबा स्वामी ललितानंद महाराज




प्रिय भक्तों,
आज प्रवचन माला का दूसरा दिन है.आपका हार्दिक स्वागत है। भक्तों की उपस्थिति दिनों-दिन बढ़ते रही है. लगता है अब आगे के प्रवचनों में पंडाल का विस्तार करना पड़ेगा. आपकी विहंगम उपस्थिति से हम प्रफ़ुल्लित हैं.

उपस्थित सज्जनों और सन्नारियों और प्यारे बच्चा लोगों को आशीर्वाद.

बच्चा लोगों इस दुनिया में नकली ढोंगी बाबा लोगों का जाल बढ़ता जा रहा है और असली संतों को भी इसका नुकसान उठाना पड रहा है. ये नित नए विवादों को जन्म देते है, जबकि संतों का काम है समाज में सौहाद्र स्थापित करके एक आनंदमयी वातारवरण का निर्माण करना.

अब प्रश्न ये उठता है कि असली-नकली की पहचान कैसे हो?

धार्मिक श्रद्धा और विश्वास के कारण हम गुरु तो बना लेते हैं, लेकिन बाद में फंस जाते हैं, इस लिए कहा गया है" पानी पियो छान कर, गुरु बनाओ जान कर", यह अति आवश्यक है, नहीं तो "लोभी गुरु लालची चेला दोनों खेले दांव, भाव सागर में डूबते, बैठ पत्थर की नाव" दोनों ही डूबे,

इसलिए भक्तों एक बात गांठ बांध लो, "ये भी देखो, वो भी देखो, देखत-देखत इंतना देखो, मिट जाये धोखा रह जाये एको", भक्तों हमारे आध्यात्मिक गुरुओ में ये गुण अवश्य होने चाहिए " उनका स्वभाव शुद्ध हो, जितेन्द्रिय हो,धन का लालच हो ही नहीं, शास्त्रों का ज्ञाता हो, सत्य तत्व को पा चूका हो, परोपकारी हो,दयालु हो, सत्यवादी हो, शांतिप्रिय हो, योग विद्या में निपुण हो, जिसमे शिष्य के दुर्गुण दूर करने की क्षमता हो, स्त्रियों में अनाशक्त हो, क्षमावान हो, धैर्यशाली हो, चतुर हो, अव्यसनी हो, प्रिय भाषी हो, निष्कपट हो,निर्भय हो, पापों से बिलकुल परे हो, सदाचारी हो, सादगी से रहता हो, धर्मप्रेमी हो, जीवमात्र का सुहृद हो, और शिष्य को पुत्र से भी बढ़ कर चाहता हो, समस्त चराचर जगत के कल्याण के लिए हो," इतने गुणों से युक्त होने से ही संत होकर इस संसार का कल्याण करने की क्षमता प्राप्त होती है",

भक्तों अब विराम और विश्राम का समय हो चुका है, अब आप असली-नकली का निर्णय स्वयं कर सकते हैं, कठिनाईयों और झंझावातों से भरे इस जीवन में शांति का अनुभव कर सकते हैं.



"पछा पछि के कारने, सब जग रहा भुलान
निरपक्ष होय के हरी भजे, सोई संत सुजान"

"जा का गुरु है आंधरा , चेला काह कराय
अंधे अँधा पेलिया, दोनों कूप पराय"

"जाना नहीं बुझा नहीं,समुझि किया नहीं गौन
अंधे को अँधा मिला, राह बतावे कौन"

"गुरु सिकलीगर कीजिए, मनहि मस्कला देई
शब्द छोलना छोलिके, चित्त दरपन कर लेई"


स्वामी ललितानंद जी महाराज

आप सभी उपस्थित भक्तों को स्वामी ललितानंद जी महाराज का आशीष।